
यूँ तो हम फिरते है तेरी गलियों में बेजान होकर
कभी न कभी तो मिलोगे मेरे खुदा अंजान होकर
नहीं करूँगा कोई अर्जी तेरी महफ़िल में
यकीं है जो मुझे चाहिए वो तू देगा मेहरबान हो कर
देर से ही सही कभी तो याद आएगी तुझे मेरी
उस दिन मै ऐसे ही मिलूँगा इन्सान होकर
देखना है तेरा सिमट कब तक रहेगा मुझ पर
कभी न कभी तू भी मेरी गलियों से गुजरेगा भगवन होकर !
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