Tuesday, April 19, 2011

मेरी हकीकत हो या एक ख्वाब कहना मुस्किल है



मेरी हकीकत हो या एक ख्वाब कहना मुस्किल है 
तुम मुह्हबत हो या जीने की जरुरत कहना मुस्किल है 
मैंने जीने के लिए एक ख्वाब बनाया है 
वो चेहरा तुम हो ये जानकर भी भूल जाना मुस्किल है 
हकीकत में जिंदगी के कुछ पन्ने ही लिखे मैंने 
उन पन्नो को खुद से फाड़ देना मुस्किल है 
एक झूठे सच को लेकर कब तक चलूँगा
तुम मेरी हो ये झूठ खुद से कब तक कहूँगा 
सच को दिल में दबा कर तुझे याद करना मुस्किल है 
लोग तो कहते ही की हम बेवफा निकले 
आज तुमने जो बेवफा कहा भरी महफ़िल में 
ये सुन कर भी जीना बड़ा मुस्किल है 
हमने तो बेवफाई की कसम खाई थी की 
तुम्हे कोई इल्जाम न दे 
बिखरे तिनको जो जोड़ना बड़ा मुस्किल है 
तुम्हारे इश्क ने रुसवा किया ज़माने से 
यूँ अकेले तन्हा जीने में बड़ी मुस्किल है 
हर एक पन्ने पे लिखा था नाम तेरा 
यु ही किसी पन्ने को खो देना जरा सा मुस्किल है