
एक माला मेरे प्रेम की !
by Raj Mishra on Tuesday, 01 March 2011 at 00:52
मै करने चला समर्पित एक माला
ना चाँदी,ना सोना ,ना हिरा ,ना ही मोती
तेरे चरणों में करने चला समर्पित
एक माला मेरे प्रेम की ,
तू निश्छल ,तू ज्ञानी
तुम हो अंतर्यामी
मेरे भी प्रेम को अपनाओ
पहनो मेरी माला प्रेम की ,
तेरे चरणों में सब कुछ है
क्या करूँ समर्पण पीड़ा थी
पहले एक हार बनाया फूलों का
फिर देखा भवरा, उस पर जा बैठा
फिर एक माला बनायीं यादों की
पर उससे भी ख़ुशी न मिली
बहुत सोचा ,बहुत घुमा
कुछ मिला नहीं संसार में
फिर उल्छां क्या करूँ समर्पित
फिर एक विस्वास मिला ,एक आश दिखी
फिर मैंने किया समर्पित
एक माला मेरे प्रेम की !
No comments:
Post a Comment